अगुवा और प्रार्थना
"मैं कई बार इस अभिभूत कर देने वाले बोध से अपने घुटनों पर आने के लिए विवश हुआ हूँ कि मेरे पास और कहीं जाने का ठिकाना नहीं था। मेरी अपनी बुद्धि और मेरे आस-पास के सब लोगों की बुद्धि उस दिन के लिए अपर्याप्त प्रतीत होती थी" अब्राहम लिंकन
याकूब 1:5 "यदि तुम नहीं जानते कि क्या करना है, तो पिता से प्रार्थना करो। वह सहायता करने से प्रेम रखता है। तुम्हें उसकी सहायता मिलेगी, और माँगने पर तुम्हें नीचा नहीं देखा जाएगा" द मैसेज
प्रार्थना एक अगुवे के जीवन में क्या करती है?
I. अगुवे की प्रार्थना उसकी नम्रता और परमेश्वर पर निर्भरता को प्रकट करती है
a. यह कहती है "मैं इसे अपने आप नहीं कर सकता"
कुलुस्सियों 2:6 "इसलिये जैसे तुम ने मसीह यीशु को प्रभु करके ग्रहण किया है, वैसे ही उसी में चलते रहो।" हमने मसीह को नम्रता में ग्रहण किया, प्रार्थना उसी मनोभाव को बनाए रखती है।
b. प्रार्थना घोषित करती है कि परमेश्वर ही प्रभारी है। हम कह तो सकते हैं कि वही प्रभारी है, लेकिन जब हम अपनी योजनाएँ स्वयं बनाते हैं और उससे उन्हें आशीषित करने के लिए कहते हैं, तो हम ऐसा व्यवहार करते हैं मानो हम ही प्रभारी हों। जैसा टिम केलर ने कहा है, "यीशु ने हमारे लिए मरने, जी उठने और अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें बुलाने का इतना बड़ा प्रयास केवल इसलिए नहीं किया कि वह मात्र हमारा सहायक बन जाए।"
c. प्रार्थना परमेश्वर को हर निर्णय के केंद्र में रखती है
1. अगुवे के जीवन के केंद्र में- न कि केवल लोगों की शिक्षाओं और विचारों पर निर्भर रहना
2. संगठन के जीवन के केंद्र में- पहला प्रश्न यह पूछा जाना चाहिए, "हमारे निर्णय के बारे में बाइबल क्या कहती है?"
d. प्रार्थना संगठन को अगुवे पर और अधिक भरोसा करने की ओर ले जाती है, क्योंकि लोग महसूस करते हैं कि वह परमेश्वर की सुन रहा है और उसकी महिमा के लिए प्रेरित है।
II. (अगले सप्ताह जारी रहेगा)

No Comments